ध्यान में होने वाले अनुभव- दो

5. दो शरीरों का अनुभव होना 
अनाहत चक्र (हृदय में स्थित चक्र) के जाग्रत होने पर, स्थूल शरीर में अहम भावना का नाश होने पर दो शरीरों का अनुभव होता ही है। कई बार साधकों को लगता है जैसे उनके शरीर के छिद्रों से गर्म वायु निकलकर एक स्थान पर एकत्र हुई और एक शरीर का रूप धारण कर लिया जो बहुत शक्तिशाली है। उस समय यह स्थूल शरीर जड़ पदार्थ की भांति क्रियाहीन हो जाता है। इस दूसरे शरीर को सूक्ष्म शरीर या मनोमय शरीर कहते हैं। कभी-कभी ऐसा लगता है कि वह सूक्ष्म शरीर हवा में तैर रहा है और वह शरीर हमारे स्थूल शरीर की नाभि से एक पतले तंतु से जुड़ा हुआ है। कभी ऐसा भी अनुभव अनुभव हो सकता है कि यह सूक्ष्म शरीर हमारे स्थूल शरीर से बाहर निकल गया। अर्थात जीवात्मा हमारे शरीर से बाहर निकल गई और अब स्थूल शरीर नहीं रहेगा, उसकी मृत्यु हो जाएगी। ऐसा विचार आते ही हम उस सूक्ष्म शरीर को वापस स्थूल शरीर में लाने की कोशिश करते हैं परन्तु यह बहुत मुश्किल कार्य मालूम देता है। स्थूल शरीर मैं ही हूँ  ऐसी भावना करने से व ईश्वर का स्मरण करने से वह सूक्ष्म शरीर शीघ्र ही स्थूल शरीर में पुन: प्रवेश कर जाता है। कई बार हम सुनते हैं कि साधक एक साथ एक ही समय दो जगह देखे गए हैं, ऐसा उस सूक्ष्म शरीर के द्वारा ही संभव होता है। उस सूक्ष्म शरीर के लिए कोई आवरण-बाधा नहीं है, वह सब जगह आ जा सकता है।

meditation
6. दिव्य ज्योति दिखना
सूर्य के सामान दिव्य तेज का पुंज या दिव्य ज्योति दिखाई देना एक सामान्य अनुभव है। यह कुण्डलिनी जागने व परमात्मा के अत्यंत निकट पहुँच जाने पर होता है। उस तेज को सहन करना कठिन होता है। लगता है कि आँखें चौंधिया गईं हैं और इसका अभ्यास न होने से ध्यान भंग हो जाता है। वह तेज पुंज आत्मा व उसका प्रकाश है।  इसको देखने का नित्य अभ्यास करना चाहिए। समाधि के निकट पहुँच जाने पर ही इसका अनुभव होता है।

7. ध्यान में कभी ऐसे लगता है जैसे पूरी पृथ्वी गोद में रखी हुई है या शरीर की लम्बाई बदती जा रही है और अनंत हो गई है, या शरीर के नीचे का हिस्सा लम्बा होता जा रहा है और पूरी पृथ्वी में व्याप्त हो गया है, शरीर के कुछ अंग जैसे गर्दन का पूरा पीछे की और घूम जाना, शरीर का रूई की तरह हल्का लगना, ये सब ध्यान के समय कुण्डलिनी जागरण के कारण अलग-अलग चक्रों के जागृत होने के कारण होता है। परन्तु साधक को इनका उपयोग नहीं करना चाहिए। केवल परमात्मा की प्राप्ति को ही लक्ष्य मानकर ध्यान में रहना चाहिए. इन पर ध्यान न देने से ये पुन: अंतर्मुखी हो जाती हैं।

8. कभी-कभी साधक का पूरा का पूरा शरीर एक दिशा विशेष में घूम जाता है या एक दिशा विशेष में ही मुंह करके बैठने पर ही बहुत अच्छा ध्यान लगता है अन्य किसी दिशा में नहीं लगता। यदि अन्य किसी दिशा में मुंह करके बैठें भी, तो शरीर ध्यान में अपने आप उस दिशा विशेष में घूम जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आपके ईष्ट देव या गुरु का निवास उस दिशा में होता है जहाँ से वे आपको सन्देश भेजते हैं। कभी-कभी किसी मंत्र विशेष का जप करते हुए भी ऐसा महसूस हो सकता है क्योंकि उस मंत्र देवता का निवास उस दिशा में होता है, और मंत्र जप से उत्पन्न तरंगें उस देवता तक उसी दिशा में प्रवाहित होती हैं, फिर वहां एकत्र होकर पुष्ट (प्रबल) हो जाती हैं और इसी से उस दिशा में खिंचाव महसूस होता है।

9. संसार (दृश्य) व शरीर का अत्यंत अभाव का अनुभव 
साधना की उच्च स्थिति में ध्यान जब सहस्रार चक्र पर या शरीर के बाहर स्थित चक्रों में लगता है तो इस संसार (दृश्य) व शरीर के अत्यंत अभाव का अनुभव होता है। यानी एक शून्य का सा अनुभव होता है। उस समय हम संसार को पूरी तरह भूल जाते हैं (ठीक वैसे ही जैसे सोते समय भूल जाते हैं)। सामान्यतया इस अनुभव के बाद जब साधक का चित्त वापस नीचे लौटता है तो वह पुन: संसार को देखकर घबरा जाता है, क्योंकि उसे यह ज्ञान नहीं होता कि उसने यह क्या देखा है?

वास्तव में इसे आत्मबोध कहते हैं। यह समाधि की ही प्रारम्भिक अवस्था है अत: साधक घबराएं नहीं, बल्कि धीरे-धीरे इसका अभ्यास करें। यहाँ अभी द्वैत भाव शेष रहता है व साधक के मन में एक द्वंद्व पैदा होता है। वह दो नावों में पैर रखने जैसी स्थिति में होता है, इस संसार को पूरी तरह अभी छोड़ा नहीं और परमात्मा की अनुभूति अभी हुई नहीं जो कि उसे अभीष्ट है। इस स्थिति में आकर सांसारिक कार्य करने से उसे बहुत क्लेश होता है क्योंकि वह वैराग्य को प्राप्त हो चुका होता है और भोग उसे रोग के सामान लगते हैं, परन्तु उसे समाधि का अभी पूर्ण अभ्यास नहीं है।

इसलिए साधक को चाहिए कि वह धैर्य रखें व धीरे-धीरे समाधि का अभ्यास करता रहे और यथासंभव सांसारिक कार्यों को भी यह मानकर कि गुण ही गुणों में बरतता रहे हैं, करता रहे और ईश्वर पर पूर्ण विश्वास रखे। साथ ही इस समय उसे तत्वज्ञान की भी आवश्यकता होती है ताकि उसके मन के समस्त द्वंद शीघ्र शांत हो जाएं। इसके लिए वह युक्तियों का चिंतन करे। जैसे जिस प्रकार समुद्र में जल ही तरंग है, सुवर्ण ही कड़ा/कुंडल है, मिट्टी ही मिट्टी की सेना है, ठीक उसी प्रकार ईश्वर ही यह जगत है,  का बारम्बार चिंतन करता रहे तो उसे जल्द ही परमतत्व का बोध होता है, सारा संसार ईश्वर का रूप प्रतीत होने लगता है और मन पूर्ण शांत हो जाता है।

10. चलते-फिरते उठते-बैठते यह महसूस होना कि सब कुछ रुका हुआ है, शांत है, मैं नहीं चल रहा हूँ, यह शरीर चल रहा है, यह सब आत्मबोध के लक्षण हैं यानि परमात्मा के अत्यंत निकट पहुँच जाने पर यह अनुभव होता है।

11. कई साधकों को किसी व्यक्ति की केवल आवाज सुनकर उसका चेहरा, रंग, कद, आदि का प्रत्यक्ष दर्शन हो जाता है और जब वह व्यक्ति सामने आता है तो वह साधक कह उठता है कि, अरे! यही चेहरा, यही कद-काठी तो मैंने आवाज सुनकर देखी थी, यह कैसे संभव हुआ कि मैं उसे देख सका? वास्तव में धारणा के प्रबल होने से, जिस व्यक्ति की ध्वनि सुनी है, साधक का मन या चित्त उस व्यक्ति की भावना का अनुसरण करता हुआ उस तक पहुँचता है और उस व्यक्ति का चित्र प्रतिक्रिया रूप उसके मन पर अंकित हो जाता है. इसे दिव्या दर्शन भी कहते हैं।

12. आँखें बंद होने पर भी बाहर का सब कुछ दिखाई देना, दीवार-दरवाजे आदि के पार भी देख सकना, बहुत दूर स्थित जगहों को भी देख लेना, भूत-भविष्य की घटनाओं को भी देख लेना, यह सब आज्ञा चक्र (तीसरी आँख) के खुलने पर अनुभव होता है।

13.  अपने संपर्क में आने वाले व्यक्तियों के मन की बात जान लेना या दूर स्थित व्यक्ति क्या कर रहा है (दुखी है, रो रहा है, आनंद मना रहा है, हमें याद कर रहा है, कही जा रहा है या आ रहा है वगैरह) इसका अभ्यास हो जाना और सत्यता जांचने के लिए उस व्यक्ति से उस समय बात करने पर उस आभास का सही निकलना, यह सब दूसरों के साथ अपने चित्त को जोड़ देने पर होता है। यह साधना में बाधा उत्पन्न करने वाला है क्र्योकि दूसरों के द्वारा इस प्रकार साधक का मन अपनी और खींचा जाता है और ईश्वर प्राप्ति के अभ्यास के लिए कम समय मिलता है और अभय कम हो पाता है जिससे साधना धीरे-धीरे क्षीण हो जाती है। इसलिए इससे बचना चाहिए। दूसरों के विषय में कतई नहीं सोचना चाहिए। सिर्फ और सिर्फ अपनी साधना की और ध्यान दें। इससे कुछ ही दिनों में यह प्रतिभा अंतर्मुखी हो जाती है और साधना पुन: आगे गहरी होती जाती है।

14. ईश्वर के सगुण स्वरुप का दर्शन

ईश्वर के सगुण रूप की साधना करने वाले साधाकों को, भगवान का वह रूप कभी आँख बंद करने या कभी बिना आँख बंद किये यानी खुली आँखों से भी दिखाई देने का आभास सा होने लगता है या स्पष्ट दिखाई देने लगता है। उस समय उनको असीम आनंद की प्राप्ति होती है। परन्तु मन में यह विश्वास नहीं होता कि ईश्वर के दर्शन किये हैं। वास्तव में यह सवितर्क समाधि की सी स्थिति है जिसमे ईश्वर का नाम, रूप और गुण उपस्थित होते हैं।  पतंजलि ने अपने योगसूत्र में इसे सवितर्क समाधि कहा है। ईश्वर की कृपा होने पर (ईष्ट देव का सानिध्य प्राप्त होने पर) वे साधक के पापों को नष्ट करने के लिए इस प्रकार चित्त में आत्मभाव से उपस्थित होकर दर्शन देते हैं और साधक को अज्ञान के अन्धकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ते चले जाते हैं। इसमें ईश्वर द्वारा भक्त पर शक्तिपात भी किया जाता है। जिससे उसे परमानन्द की अनुभूति होती है। कई साधकों/भक्तों को भगवान के मंदिरों या उन मंदिरों की मूर्तियों के दर्शन से भी ऐसा आनंद प्राप्त होता है। ईष्ट प्रबल होने पर ऐसा होता है। यह ईश्वर के सगुण स्वरुप के साक्षात्कार की ही अवस्था है। इसमें साधक कोई संदेह न करें।

15. कई सगुण साधक ईश्वर के सगुण स्वरुप को उपरोक्त प्रकार से देखते भी हैं और उनसे वार्ता भी करने का प्रयास करते हैं। इष्ट प्रबल होने पर वे बातचीत में किये गए प्रश्नों का उत्तर प्रदान करते हैं, या किसी सांसारिक युक्ति द्वारा साधक के प्रश्न का हल उपस्थित कर देते हैं। यह ईष्ट देव की निकटता व कृपा प्राप्त होने पर होता है। इसका दुरुपयोग नहीं करना चाहिए। साधना में आने वाली कठिनाइयों को अवश्य ही ईश्वर से कहना चाहिए और उनसे सदा मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना करते रहना चाहिए। वे तो हमें सदा राह दिखने के लिए ही तत्पर हैं परन्तु हम ही उनसे राह नहीं पूछते हैं या वे मार्ग दिखाते हैं तो हम उसे मानते नहीं हैं, तो उसमें ईश्वर का क्या दोष है? ईश्वर तो सदा सबका कल्याण ही चाहते हैं।

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