जब अंगुलिमाल डाकू से संत बना

जब अंगुलिमाल डाकू से संत बना

प्राचीन समय में अंगुलिमाल नाम का एक बहुत बड़ा डाकू था। वह लोगों को मारकर उनकी उंगलियां काट लेता था और उनकी माला पहनता था। इसी से उसका नाम अंगुलिमाल नाम पड़ा। लोगों को लूट लेना, उनकी जान ले लेना, उसके बाएं हाथ का खेल था। लोग उससे डरते थे। उसका नाम सुनते ही उनके प्राण सूख जाते थे। संयोग से एक बार भगवान बुद्ध उधर से निकले। लोगों ने उनसे प्रार्थना की कि वह यह क्षेत्र छोड़ दें। यहां अंगुलिमाल का इलाका है। अंगुलिमाल ऐसा डाकू है, जो किसी के आगे नहीं झुकता। बुद्ध ने लोगों की बात सुनी, पर उन्होंने अपना इरादा नहीं बदला। वह बेधड़क होकर वहां घूमने लगे। जब अंगुलिमाल को इसका पता चला तो वह गुस्से में बुद्ध के पास आया। वह उन्हें मार डालना चाहता था, लेकिन जब उसने बुद्ध को मुस्कराकर प्यार से उसका स्वागत करते देखा तो उसका पत्थर का दिल कुछ मुलायम हो गया।

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बुद्ध ने उससे कहा क्यों भाई, तुम हमें मारना चाहते हो तो उसने कहा हॉं! इस पर बुद्ध ने उससे कहा कि पहले तुम सामने के पेड़ से चार पत्ते तोड़ लाओ? अंगुलिमाल के लिए यह काम क्या मुश्किल था! वह दौड़ कर गया और जरा-सी देर में पत्ते तोड़कर ले आया।

बुद्ध ने कहा, अब एक काम करो। जहां से इन पत्तों को तोड़कर लाये हो, वहीं इन्हें लगा आओ। अंगुलिमाल तमतमाकर बोला, यह कैसे हो सकता? इस पर बुद्ध ने कहा, भैया! जब जानते हो कि टूटा जुड़ता नहीं तो फिर तोडऩे का काम क्यों करते हो? इतना सुनते ही अंगुलिमाल का गुस्सा शांत हो गया और बोध को प्राप्त हो गया। वह, उस दिन से बुरे काम और मारपीट, खून खराबा छोड़कर बुद्ध की शरण में आ गया। बाद उनकी राह पर चलते हुए ज्ञान को प्राप्त हुआ।

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