नाम नहीं, कर्म ही प्रधान

नाम नहीं, कर्म ही प्रधान

बहुत पुरानी बात हैं। एक बच्चे के माँ-बाप ने उसका नाम पापक (पापी) रख दिया। बालक जब बड़ा हुआ तो उसे यह नाम बुरा लगने लगा। उसने अपने माता-पिता से प्रार्थना की, आचार्य से प्रार्थना की, आप मेरा नाम बदल दें। यह नाम बड़ा अप्रिय है। यह अशुभ और अमांगलिक का प्रतीक है। आचार्य ने उसे समझाया कि नाम तो केवल नाम के लिए है, व्यवहार में, जगत में पुकारने के लिए होता है। नाम बदलने से कोई मतलब सिद्ध नहीं होगा। कोई पापक नाम रखकर भी अपने सद्कर्मों से धार्मिक बन सकता है और धार्मिक नाम रहे तो भी दुष्कर्मोंसे कोई पानी बन सकता है। मुख्य बात तो कर्म की है। नाम बदलने से क्या होगा और इससे वह धार्मिक व ज्ञानी तो हो नहीं जाएगा।

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पर वह आचार्य की बात नहीं माना। आग्रह और निवेदन करता ही रहा। जब नहीं माना तो आचार्य ने कहा, अर्थ-सिद्ध तो कर्म के सुधारने से होगा, परन्तु यदि तू नाम भी सुधारना चाहता है तो जा, गांव में जाकर लोगों को देख और जिसका नाम तुझे मांगलिक लगे, वह मुझे बता। तेरा नाम वैसा ही बदल दिया जायगा।

पापक सुन्दर नामवाले व्यक्ति की खोज में निकल पड़ा। घर से बाहर निकलते ही उसे शव-यात्रा के दर्शन हुए। पूछा, कौन मर गया? लोगों ने बताया जीवक। पापक सोचने लगा-नाम जीवक, पर मृत्यु का शिकार हो गया! वह आगे बढ़ा तो देखा, किसी दीन-हीन गरीब दुखियारी महिलाओं को मारपीट कर घर से निकाला जा रहा है। पूछा, कौन है यह? जवाब मिला, धनपाली। पापक विचारने लगा नाम धनपाली और पैसे-पैसे के लिए मोहताज! वह और आगे बढ़ा तो एक आदमी को लोगों से रास्ता पूछते हुए उसका नाम पूछा, तो पता चला-उसका नाम पंथक है। नाम सुन पापक फिर सोच में पड़ गया-अरे, पंथक भी पंथ पूछते हैं? पंथ भूलते हैं? पापक आचार्य श्री के पास वापस लौट आया। अब नाम के प्रति उसका आकर्षण-विकर्षण दूर हो चुका था। उसे बात समझ में आ गई थी। क्या रखा है नाम में? जीवक भी मरते हैं, अ-जीवक भी, धनपाली भी दरिद्र होती है, अधनपाली भी, पंथक राह भूलते हैं, अंपथक भी, जन्म का अंधा नाम नयनसुख, जन्म का दुखिया, नाम सदासुख! सचमुच नाम की थोथी महत्ता निरर्थक ही है। रहे नाम पापक, मेरा क्या बिगड़ता है? मैं अपन कर्म सुधारुंगा। कर्म ही प्रमुख है, कर्म ही प्रधान है। उसके लिए नाम से कर्म प्रधान हो गया।

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