पंडितजी को ज्ञान बोध

पंडितजी को ज्ञान बोध

एक पंडित जी थे। उन्होंने एक नदी के किनारे अपना आश्रम बनाया हुआ था। पंडित जी बहुत विद्वान थे। दूर-दूर तक उनकी ख्याति थी और लाखों उनके भक्त थे। उनके आश्रम में दूर-दूर से लोग ज्ञान प्राप्त करने आते थे।

 

panditनदी के दूसरे किनारे पर एक लक्ष्मी नाम की ग्वालिन अपने वृद्ध पिता के साथ रहती थी। लक्ष्मी पूरे दिन अपनी गायों को देखभाल करती थी। सुबह जल्दी उठकर अपनी गायों को नहला कर दूध दोहती, फिर पिताजी के लिए खाना बनाती, इसके बाद दूध बेचने के लिए निकल जाया करती थी।
पंडित जी के आश्रम में भी दूध लक्ष्मी के यहाँ से ही आता था। एक बार पंडित जी को किसी काम से शहर जाना था। उन्होंने लक्ष्मी से कहा कि उन्हें शहर जाना है, इसलिए अगले दिन दूध उन्हें जल्दी चाहिए। लक्ष्मी अगले दिन जल्दी आने का वादा करके चली गयी।

लक्ष्मी ने अगले दिन सुबह जल्दी उठकर अपना काम जल्दी-जल्दी समाप्त किया और जल्दी से दूध उठाकर आश्रम की तरफ निकल पड़ी। नदी किनारे उसने आकर देखा तो मल्लाह अभी तक आया नहीं था। लक्ष्मी बिना नाव के नदी कैसे पार करती ? फिर क्या था, लक्ष्मी को आश्रम तक पहुँचने में देर हो गई। आश्रम में पंडित जी जाने को तैयार खड़े थे। वे सिर्फ लक्ष्मी का इंतजार कर रहे थे। लक्ष्मी को देखते ही उन्होंने लक्ष्मी को डाँटा और देरी से आने का कारण पूछा।

लक्ष्मी ने भी मासूमियत से पंडित जी से कहा कि नदी पर कोई मल्लाह नहीं था, वह नदी भला कैसे पार करती ? इसलिए उसे आश्रम पहुंचने में देर हो गई।
पंडित जी तो गुस्से से भरे खड़े थे ही, उन्हें लगा कि लक्ष्मी बहाने बना रही है। उन्होंने भी गुस्से में लक्ष्मी से कहा, बहाने क्यों बनाती है। लोग तो जीवन सागर को भगवान का नाम लेकर पार कर जाते हैं, तुम एक छोटी सी नदी पार नहीं कर सकती ?Ó पंडित जी की बातों का लक्ष्मी के चित्त पर गहरा असर हुआ। दूसरे दिन भी जब लक्ष्मी दूध लेकर आश्रम जाने निकली तो उस दिन भी नदी पर मल्लाह नहीं था। लक्ष्मी ने मल्लाह का इंतजार नहीं किया। उसने भगवान को याद किया और पानी पर चलकर आसानी से नदी पार कर ली और आश्रम जा पहुंची। इतनी जल्दी लक्ष्मी को आश्रम में देखकर पंडित जी तो हैरान रह गये, उन्हें पता था कि कोई मल्लाह तो इतनी जल्दी नहीं आता है। उन्होंने लक्ष्मी से पूछा कि तुमने आज नदी कैसे पार की ?

लक्ष्मी ने सरलता से कहा—”पंडित जी आपके बताये हुए तरीके से। मैंने भगवान का नाम लिया और पानी पर चलकर नदी पार कर ली ।
पंडित जी को लक्ष्मी की बातों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने लक्ष्मी से फिर पानी पर चलने के लिए कहा। लक्ष्मी नदी के किनारे गई और उसने भगवान का नाम जपते-जपते सहज से नदी को पार कर लिया।

पंडित जी लक्ष्मी को नदी पर चलता देख हैरान रह गए। उन्होंने भी लक्ष्मी की तरह नदी पार करना चाही। पर नदी में उतरते वक्त उनका पूरा ध्यान अपनी धोती को गीली होने से बचाने में लगा था। वह पानी पर नहीं चल पाए और धड़ाम से पानी में गिर गए। पंडित जी को गिरते देख लक्ष्मी ने हँसते हुए कहा, ”आपका  तो सारा ध्यान भगवान के बजाय अपनी नई धोती को बचाने में लगा हुआ था।

पंडित जी को तुरंत अपनी गलती का अहसास हो गया। उन्हें अपने ज्ञान पर बड़ा अभिमान था। पर अब उन्होंने जान लिया था कि भगवान को पाने के लिए किसी भी बाह्य ज्ञान की जरूरत नहीं होती। भगवान को पाने के लिए तो सिर्फ सच्चे मन से याद करने की जरूरत है।

कहानी का भावार्थ है कि अगर सच्चे मन से परमेश्वर को याद किया जाए, तो वे आवश्यक रुप से मिलते हैं और तत्काल अपने भक्तों की मदद करने के लिए उद्धत होते हैं।

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