सहजयोग: चेतना के नए आयाम का द्वार

mata-jiसंस्कृत में सहज के दो तत्व हैं। सह का अर्थ है के साथ और ज का अर्थ है उत्पन्न। समग्र रूप में सहज का मतलब है सरल, प्राकृतिक या स्वभाविक और योग का अर्थ है संयोजन, जुडऩा और आध्यात्मिक तन्मयता। सहजयोग को जानने का मतलब है परमेश्वर के प्रति संपूर्ण समर्पण। हालांकि शब्दों से इसकी व्याख्या नहीं हो सकती है।  विशुद्ध अनुभति से ही इसके आयाम को जाना सकता है।  सहजयोग की प्रवर्तक श्रीमाताजी निर्मला देवी हैं। उनका जन्म 21 मार्च 1923 को छिंदवाड़ा में एक ईसाई परिवार में हुआ।  आईएएस श्री सीपी श्रीवास्तव के साथ उनका विवाह हुआ, जो कि तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के सचिव रहे। श्रीमाताजी बाल्यकाल में महात्मा गांधी के आश्रम में रहीं और उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भी भाग लिया। डमन-डियू प्रदेश के नारगोल (जो कि समुद्र के बीच-बीच स्थित) नामक स्थान पर रहकर श्रीमाताजी ने कई सालों तक गहन आध्यात्मिक साधना की। इसी जगह श्रीमाताजी को बोध की प्राप्ति हुई और उन्होंने अपना सहस्त्रार (ब्रह्रंध) खोला। श्रीमाताजी ने वर्ष 1974 में भारत और इंग्लैंड से सहजयोग का फैलाव शुरू किया। सहजयोग को विश्व निर्मला धर्म  के नाम से जाना जाता है। आज दुनिया के 120 से ज्यादा देशों में सहजयोग केंद्र स्थापित हैं, जहां रोजाना हजारों लोग आत्म-साक्षात्कार कर जीवन के साध्य को जान रहे हैं। सहजयोग  15वीं सदी के संत कबीर के काल जितना पुराना है। प्राचीन काल में यह सुरती और सिद्धयोग के पर्याय के तौर पर प्रयोग किया जाता रहा है।
सहजयोग, ध्यान का एक अलग, नया आयाम और अनोखा आयाम है। जो आत्म-साक्षात्कार (कुंडलिनी शक्ति) के रूप में प्रत्येक मनुष्य के भीतर घटित हो सकता है। सहजयोग से आंतरिक रूपांतरण होता है। व्यक्ति नश्वरता से विज्ञ होता है। वह संगठित, समृद्ध, संपूर्ण और संतुलित बनता है। श्रीमाताजी के अनुसार आत्म-साक्षात्कार (स्व बोध) के लिए मूलाधार में त्रिकोणाकार अस्थि में सुषुप्ता अवस्था में बैठी कुंडलिनी शक्ति को जागृत किया जाता है। कुंडलिनी शक्ति जैसी ही मूलाधार से उठकर स्वधिष्ठान, मणिपुर (भवसागर), अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा चक्र से होती हुई सहस्त्रार (तालू) पर पहुंचती है, साधक चक्रों (सातों चक्र) और शीतल लहरियों और विचारहीनता (साक्षीपन) का अनुभव करता है।  आदि शंकराचार्य ने इन शीत लहरियों को सलिलम, सलिलम कहा। इस दौरान साधक अनुभव कर सकता है कि दैवीय शक्ति (कुंडलिनी शक्ति) संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त और आच्छादित है। उसकी शक्ति से ही संपूर्ण ब्रहंड संचालित और नियंत्रित हो रहा है। यह कुंडलिनी शक्ति ही जड़-चेतन जगत में धड़क रही है। आत्म-साक्षात्कार (स्व बोध) की अनुभूति कहीं भी कभी की जा सकती है। चलते, फिरते, उठते, बैठते कहीं भी इसकी अनुभूति की जा सकती है। इसके लिए सिर्फ शुद्ध इच्छा करनी होती है।
सामान्य तौर पर सहजयोग में पीठ के सहारे सीधा बैठा जाता है। पीठ को सीधा रखते हुए आरामदायक स्थिति बनाई जाती है। दोनों हाथ, हथेलियां ऊपर की ओर खोलकर गोद में रखे जाते हैं। श्रीमाताजी की तस्वीर की ओर देखते हुए पूरे शरीर को शिथिल छोड़ दिया जाता है। हृदय में पूरी शुद्ध इच्छा के साथ कहा जाता है कि, श्रीमाताजी मुझे आत्म-साक्षात्कार (स्व बोध) दीजिए। इसे तीन बार पूरे भाव से बोला जाता है। सहजयोग में शुद्ध इच्छा और शुद्ध भावना ही महत्वपूर्ण है। यह विद्या प्रयास विहीनता (द्गद्घद्घशह्म्ह्लद्यद्गह्यह्य) से मिलती है। सहजयोग ध्यान हुआ कि नहीं, अंत में इसके लिए साधक जांचता है कि क्या तनाव मुक्त है? क्या उसके विचारों के चपलपन में कुछ कमी आई है या वे धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं। यह सहजयोग ध्यान की पहली अवस्था होती है-विचारहीन चेतना, जहां साधक बिना विचारों के विचारों के प्रति पूरी तरह सचेत होता है। वह विचारों का साक्षी हो जाता है। वह सिर्फ एक दृष्टा होता है। वह प्रत्येक विचार, घटना, कार्य में लिप्त (शामिल) होने के बजाय उसका साक्षी हो जाता है। जैसे एक पहाड़ पर खड़े होकर जब हम संसार को देखते हैं तो हमें लोग सिर्फ आते-जाते, चलते-फिरते भर दिखाई देते हैं। बिल्कुल इसी तरह से सहजयोग में स्थापित होने के बाद हमें विचार आते-जाते दिखाई देने लगते हैं और हम उसके साक्षी बने रहते हैं। इस दौरान वह शुद्ध और शांति पूर्ण चेतन की अवस्था में होता है। इस साक्षी की अवस्था में वह देखता है कि क्या वह अपनी हथेलियों और सिर पर शीतल लहरियां (ठंडी हवा) की अनुभूति कर रहा है। साधना की शुरुआत में यह गर्म-गर्म हो सकती हैं, जो कि इस बात का संकेत होती हैं कुंडलिनी शक्ति ने व्यक्ति के चक्रों को शुद्ध करना शुरू कर दिया है। अंतत: लगातार ध्यान में ज्यादा ठहरने पर यह ताप का त्याग कर ठंडी हो जाती है। इसे जांचने के लिए अपनी बाईं हथेली को सहस्त्रार (तालू भाग) पर 6 से 12 इंच ऊपर रखा जाता है। इसके बाद दाईं हथेली से यही प्रयास किया जाता है। अगर व्यक्ति गर्म-गर्म हवा की अनुभूति करता तो माना जाता है कि संभवत: उसने प्रत्येक को क्षमा नहीं किया है। ऐसे में वह फिर हृदय पर हाथ रखकर कहता है कि, श्रीमाताजी मैने प्रत्येक को क्षमा कर दिया है। इसे कई बार करके वह अपने आपको जांच सकता है कि क्या वह अपने सहस्त्रार (तालू) के ऊपर शीतल लहरियां को अनुभव कर पा रहा है।
सहजयोग ध्यान व्यक्ति की अदभुत आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत है। यह उसकी चेतना के नए आयाम को खोलने का द्वार है। इस चेतना को विस्तृत किया जा सकता है। मूलत: सहजयोग ध्यान व्यक्ति का स्वभाव है। जब वह अपने इस स्वभाव में स्थित हो जाता है तो अपने सूक्ष्म केंद्रों (चक्रों) कर अनुभूति करने लगता है। इसके साथ ही दूसरे लोगों के चक्रों की अनुभूति अपनी अंगुलियों के पोरों (अंगुली के अग्रभाग) पर की जा सकती है। यही नहीं इन चक्रों पर कोई खराबी (विकार) हैं, तो अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा (कुंडलिनी) से उन्हें ठीक किया जा सकता है।
सहजयोग सिखाता है कि किस तरह से मूलाधार (गुदा द्वार) के ऊपर स्थित त्रिकोणाकार अस्थि में प्रसुप्ता अवस्था में बैठी कुंडलिनी शक्ति (दैवीय ऊर्जा ) को जागृत करके चक्रों को संतुलित किया जा सकता है। श्रीमाताजी के अनुसार, कुंडलिनी हमारी पवित्र आत्मा या आदि शक्ति का प्रतिबिंब है। यह ईश्वर की इच्छा और कार्य शक्ति होती है। माताजी कहती हैं कि कुंडलिनी को जागृत किए बिना सहजयोग होना असंभव है। जब कुंडलिनी जागृत होती है और ऊपर की ओर उठती है तो इन चक्रों के गुण सहज प्रकट होने लगते हैं। ज्यादातर बीमारियां इन चक्रों में खराबी का परिणाम होती हैं। कुंडलिनी के जागृत होते ही ये बीमारियां स्वत: शरीर से भागने लगती हैं।
श्रीमाताजी के अनुसार जब कुंडलिनी शक्ति द्वारा सहस्त्रार (ब्रह्मरंध) चक्र का भेदन किया जाता है तो व्यक्ति अपने सिर के ऊपर और हाथों की हथेलियों पर ठंडा-ठंडा (शीत लहरियां) महसूस होने लगता है। इस अनुभूति को सहजयोग में आत्म-साक्षात्कार (स्व बोध) कहा गया है। यह शीतल लहरियों या कंपन बोध दैवीय ऊर्जा माना जाता है। अगर इस दौरान गर्मी, जलन, झनझनाहट महसूस हो तो इसका अर्थ है कि कुंडलिनी इस स्थिति को पाने के लिए काम कर रही है। हाथ, सिर और शरीर के विभिन्न हिस्सों में होने वाली इस अनुभूति का इस्तेमाल चक्रों और नाडिय़ों के दोषों (असंतुलन) के निदान के लिए किया जाता है। आत्म-साक्षात्कार (स्व बोध) के बाद व्यक्ति विचारहीनता का अनुभव कर सकता है, जिसे निर्विचार समाधि कहा गया है। निर्विचार समाधि में ही कुंडलिनी शक्ति चक्रों का भेदन करती है। क्योंकि इडा और पिंगला नाडिय़ों का अतिसक्रिय होना मानसिक तनाव, मनो विकार और मृत आत्माओं से संपर्क का कारण होता है। जबकि चक्रों के दोष मानसिक और शारीरिक रोगों का कारण होते हैं। सहजयोग से ब्लड प्रेशर, दमा, मिर्गी, शुगर, कैंसर जैसी तमाम लाइलाज बीमारियों का इलाज किया जा सकता है।
सहजयोग घटित होगा शुद्ध इच्छा करें
श्रीमाताजी कहती हैं कि सहजयोग आत्मा के परमात्मा से मिलन का आयाम है। यह मिलन प्रेम से परिपूर्ण हुए बिना संभव ही नहीं है। सहजयोग से कुंडलिनी शक्ति जागरण संभव है। यह कुंडलिनी शक्ति रीढ़ की हड्डी जहां से उठती और आधार बनाती है वहां स्थित त्रिकोणाकार अस्थि में सुषुप्ता अवस्था में विद्यमान है। स्वभावत: इस शक्ति का उद्धेश्य परमात्मा से एकाकार होना है। कुंडलिनी शक्ति मूलाधार चक्र से उठकर स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा चक्र से होते हुए सहस्त्रार तक की लंबी यात्रा तय करती है। हर चक्र उसका विश्राम स्थल है। उसके जागृत होकर वहां तक पहुंचने के संकेत अलग-अलग सिद्धियों के रूप में सामने आते हैं। सहस्त्रार कुंडलिनी का आखिरी पड़ाव है। यहां पहुंचकर ही व्यक्ति सिद्ध और संबुद्ध कहलाता है। श्रीमाताजी दुनिया की एकमात्र संत हैं जिन्होंने कुंडलिनी शक्ति पर इतनी विस्तार से काम किया। इसके पहले आदि शंकराचार्य ने कुंडलिनी शक्ति का उल्लेख किया, लेकिन उन्होंने कहा, कुंडलिनी सूक्ष्म शरीर योग विद्या का विषय है और इसको जागृत करने लंबी और कठोर साधना चाहिए। जबकि श्रीमाताजी कहती हैं, कुंडलिनी शक्ति की जागृति के लिए कठोर साधना नहीं, शुद्ध इच्छा चाहिए। यह बहुत आसान है। साधक आसन बिछाकर पालथी मारकर सीधे बैठ जाता है। दोनों हाथ की हथेलियां घुटनों पर। सामने श्रीमाताजी का चित्र रखना होता है। साधक गहरी सांस लेकर और फिर छोड़कर भावना करता है कि दुनियादारी पीछे छूट गई। ध्यान नौ चरणों में पूरा होता है। पूर्ण शांत और अविचल स्थिति में बैठकर पहले चरण में सहजयोगी दाहिना हाथ उठाता है और हथेली हृदय (दिल) पर रखता है। अपने आप से पूछता है कि मॉ, क्या मैं आत्मा हॅू? दूसरे चरण में फिर हाथ पेट पर लाता है और पूछता है कि मॉं, क्या मैं अपना स्वामी हॅू? तीसरे चरण में फिर हाथ को नाभि से थोड़ा नीचे ले जाते हुए प्रार्थना करता है कि मॉ मुझे पावन बना दो। चौथे चरण में हथेली कुछ ऊपर लाता है और कहता है-मॉ मैं अपना स्वामी आप हॅू। पांचवें चरण में हृदय पर हाथ रखकर कहता है कि मैं एक पवित्र आत्मा हॅू। छठवें चरण में गर्दन के पीछे बाईं ओर हाथ ले जाकर पूछता है कि मुझसे क्या कोई अपराध हुआ है? सातवें चरण में सिर पर हाथ रखकर अपने आपको कहता है कि मैं सबकुछ भूल रहा हॅू। अपने आपको भी भूल रहा हूूॅ। मुझे कुछ याद नहीं है। फिर दायां हाथ सिर के पीछे ले जाकर प्रार्थना की जाती है कि परमचैतन्य सत्ता के सम्मान में कोई गुस्ताखी हो गई हो तो मॉ कृपाकर मुझे क्षमा कर दें। अब अंतिम चरण में सिर पर सहस्त्रार (तालू) पर घड़ी की सुई की तरह हाथ घुमाते हुए प्रार्थना की जाती है कि मॉं मुझे आत्म-साक्षात्कार कराओ। इस प्रार्थना के साथ साक्षी में प्रतीक्षा की जाती है। अनुभव होता है कि शक्ति का प्रवाह हो रहा है। परमात्मा में अपना अस्तित्व घुलमिल रहा है। साक्षात्कार हो रहा है। सिर्फ आनंद और आनंद की अनुभूति हो रही है।

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