मृत्यु के बाद कहां जाऊंगा?

मैं कौन हॅू, मैं दुनिया में कहां से आया हॅू, क्यों आया हूॅं और मुझे यहां से क्या लेकर जाना है? जन्म से पहले मैं क्या था, मृत्यु के बाद कहां जाऊंगा?यह हममें से प्रत्येक के लिए रहस्य और खोज का विषय है। क्या नहीं है? लेकिन यह प्रश्न हममें से प्रत्येक के लिए  सबसे अहम प्रश्न होने के बाद भी अब अहम नहीं रह गए हैं। मैं कौन हॅू, यह प्रश्न अब हमारे लिए जरावस्था का प्रश्न हो गया है। कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो सारी दुनिया का 95 फीसदी मनुष्य सिर्फ भौतिक उपलब्धियों और सेक्स के लिए पागल हंै। प्रेम, सुख और शांति की चाह में वह धार्मिक स्थलोंं में, संतों-गुरुओं के पास भटक रहा है। शांत होने के लिए वह सेक्स के नए-नए ओटपाए (साधन) तलाश रहा है। उसके भीतर एक ही जुनून है कि यह पा लिया, अब वो हासिल करना है। सबको पीछे छोड़कर दुनिया का सारा प्रेम, सारा सुख और सारी उपलब्धियां खुद पा लेना चाहता है। वह अपने प्रति पूर्णत: अंजान और अनभिज्ञ है, लेकिन दुनिया की हर जानकारी हासिल करना चाहता है। वह देश-दुनिया में हर दिन हो रहे सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक बदलावों के बारे में जानना चाहता है। उसका एक ही ध्येय है जानकारियों के मामले में वह सबसे अपडेट कैसे रहूं? अपडेट रहने के लिए वह हर पल की सूचनाएं चाहता है। वह पूर्णत: टीवी और इंटरनेट मुखी हो गया है। इनके बिना रहना-जीना अब उसके लिए मुश्किल होता जा रहा है। मनुष्य भले ही यह नहीं जानता हो कि मैं कौन हॅू? लेकिन भारत का औसत आदमी पिछले दो दशकों में ज्यादा धार्मिक और धर्म-भीरू हुआ है। बाजारवादी कुछेक संत आशारामों ने उसकी इस धार्मिक भीरूता का बेजा फायदा भी उठाया है। आज टीवी चैनलों पर प्रवचनकारों की बाढ़सी आई है। कथित संत-महात्माओं केे साथ मंदिरों-मजिस्दों, गुरुद्वारों, गिरजाघरों और आश्रमों की हर दिन देश में संख्या बढ़ रही है। धार्मिकता सिखाने के लिए रोजाना हजारों नई-नई किताबेंं बाजार में आ रही हैं। मनुष्य को धार्मिक बनाने और बनने की होड़ चल रही है। इस देश में 80 से 90 फीसदी संत-महात्मा ऐसे हैं जिन्हें जेल में होना चाहिए था, आज आश्रमों में और घरों में चित्र के रूप में कथित श्रद्धा के तौर पर पूजे जा रहे हैं। संत-महात्मा, भगवाधारी का शिष्य बनने की इस देश में होड़सी मची हुई है। जो जितना बड़ा धन पशु है उतना बड़ा धार्मिक दिखाई देता है।

naam-nahi

ब्राह्मण के तौर पर पूजा-कर्म करने वाले ब्रह्म शब्द के मायने नहीं जानते, बस कुछ शास्त्रोक्त जानकारियां हासिल कर भगवान और भक्त के बिचौलिया बन बैठे हैं। मुसलमान हैं कि मुसलमान शब्द की रेड़ मारकर रख दी है। मुसलमान को दुनिया में प्रेम और ईमान कायम करने के लिए भेजा गया था। आज इस्लाम और मुसलमान को आतंक का पर्याय बन गया है। मुसलमानों से भारत, अमेरिका सहित दुनिया के सारे देश डरे हुए हैं। महावीर ने कहा- आत्मा ही पथ है, आत्मा ही साधन है और आत्मा ही साध्य है यानी खुद को जानना ही व्यक्ति के लिए जीवन का हेतु है। लेकिन महावीर के नाम की धर्म-ध्वजा उठाकर चलने वाले जैनियों की क्या कहें? जैनिज्म को बदनाम कर रहे हैं, खुद मुनि न होकर दूसरों को मुनि बनाने की जैसे इन्होंने ठान ली है। दिनभर लोगों के गले काटते हैं, सुबह मंदिर में जाकर अपरिग्रह का व्रत लेते हैं। मुनियों की पूजा करते हैं। उन्हें आहार कराकर ऐसा मान लेते हैं जैसे इनके सारे पाप धुल गए। खुद बुद्ध के अनुयायी बुद्ध को भगवान बनाकर पूज रहे हैं। बजाय खुद को जानने की मैं कौन हॅू? के उनकी प्रतिमा लगाकर उनकी पूजा-अर्चना कर रहे हैं। जबकि बुद्ध खुद व्यक्ति पूजा के खिलाफ रहे। उन्होंने कहा कि संघम शरण गच्छामि….खुद के भीतर जाओ और ये जानो की मैं कौन हूॅ? यही हाल इसाइयों का है। नशा करना हर पंथ-धर्म में एक गंभीर बुराई है, लेकिन ये शराब पीने को धार्मिक रस्म मानते हैं। दुनिया में ईसाइयत का सबसे बड़ा प्रवर्तक अमेरिका दुनिया में हथियारों का सबसे बड़ा सौदागर बना हुआ है। दुनिया में जितने तथाकथित संत हैं उतने पंथ हो गए हैं। सब कह रहे हैं कि हमारी पूजा करो, तुम्हारा कल्याण होगा।

सवाल है कि मैं कौन हॅू , जो मैं हॅू वह नहीं जान लेता, तब तक हममें से प्रत्येक क्या प्रकाश हीनता में नहीं है? और हमारी सारी गतिविधियां, हमारी प्रेम, सुख, शांति और उपलब्धियों के लिए यह भागम-भाग अंधेरे की ओर दौड़ नहीं है। इसे ऐसा कहेंगे कि जन्मा तो बेहोशी में और मरा तो बेहोशी में। खुद को भूल न जाने किस खुदा को तलाशता रहा।

Leave a Reply